मुंबई,25 । भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन के खास अवसर के लिए पालघर जिले की आदिवासी महिलाओं ने बांस से मनमोहक राखियां तैयार की हैं। इन राखियों की विदेशों में भी भारी मांग है, जिससे पालघर की आदिवासी महिलाओं का हुनर पहली बार सात समुंदर पार भी पहुंच रहा है।
पिछले कुछ साल में देश में बांस की महत्ता पर जोर दिया गया है। बांस एक ऐसा वृक्ष है, जो आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही रोजगार के मौके भी देता है। इसकी एक बानगी पालघर में भी देखने को मिली, जहां बांस और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग कर नए इनोवेटिव तरीके से राखी का निर्माण हो रहा है। सिर्फ राखी ही नहीं यहां घर में प्रयोग होने वाले एक से बढ़ कर एक सामान और अगरबत्ती का भी उत्पादन किया जा रहा है। बांस यहां की संस्कृति में रचा-बसा हुआ है। बांस का उपयोग यहां के धार्मिक विधि-विधानों को पूरा करने में भी आमतौर पर किया जाता है। पालघर के विक्रमगढ़ और जव्हार जैसे ग्रामीण इलाकों की रहने वाली आदिवासी महिलाएं इन्हीं बांस के उपयोग से राखियां बना रही हैं। इस वर्ष भी बांस से बनी राखियां बहनें अपने भाइयों की कलाइयों पर बांधेंगी और उनकी लंबी आयु की कामना करेंगी। केशव श्रृष्टि संस्था के सह सचिव संतोष गायकवाड़ ने बताया कि बांस से बनी राखियों को बनाने के कार्य से करीब 450 महिलाओं को रोजगार मिला है, जिससे उन्हें काम की तलाश में अब भटकना नहीं पड़ता। इन महिलाओं को करीब साढ़े तीन सौ रुपए की रोजाना कमाई हो जाती है। राखियों से होने वाली आय पूरी तरह कार्य में लगी महिलाओं की होती है।
उन्होंने बताया कि इन राखियों की कीमत 35 रुपए से शुरुआत की गई है, हम इस तरह की राखियां थोक में तैयार करते हैं और फिर इसे पूरे देश में बेचते हैं। इस बार 50 हजार राखियां तैयार की गई हैं। देश की सीमाओं पर तैनात जवानों के लिए 10 हजार राखियां भेजी गई हैं। साथ ही अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भी राखियां भेजी गई हैं। पूरे देश में बांस से बनी राखियों की काफी मांग है। बांस से राखियों को बना रही महिलाओं ने बताया कि कई डिजाइन में राखियां बनाई गई हैं। पर्यावरण के अनुकूल होने के अलावा वे किफायती भी हैं। महिलाओं को राखी के आनलाइन और ऑफलाइन ऑर्डर मिल रहे हैं। पहले ये महिलाएं खेती करती थीं और खेतों में मेहनत-मजदूरी का काम करती थीं। अब इन्हें धूप में काम नहीं करना पड़ता और अपने पसंद का काम भी मिल गया है।
गौरतलब है कि चीनी राखियों के बहिष्कार के बाद अब बाजार इन राखियों का विकल्प तलाश रहा है। इन स्वदेशी राखियों ने यहां की महिलाओं को भी रोजगार दे दिया है। आदिवासी महिलाएं चीनी राखियों को टक्कर देने के लिए बांस से मनमोहक राखियां तैयार कर रही हैं। बता दें कि बीते कई दिनों से आदिवासी महिलाएं घर का जरूरी काम निपटाकर अपने घरों से निकलकर दिनभर रंग-बिरंगी राखियां बना रही हैं। यहां की एक स्थानीय गैर-लाभकारी संस्था इन महिलाओं को आजीविका कमाने में मदद करने के लिए प्रशिक्षण दे रही है। ये महिलाएं राखी बनाने के लिए स्थानीय बांस का उपयोग करती हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल हैं लेकिन आधुनिक डिजाइन हैं। महिलाओं ने कहा कि पालघर में कई तरह के बांस मिल जाते हैं। यहां का शिल्प मर रहा था। हम इस शिल्प को पुनर्जीवित करना चाहते थे।